अतृप्त पितरों की मुक्ति और वंश की समृद्धि हेतु

त्रिपिंडी श्राद्ध हिंदू धर्मशास्त्र का एक विशेष एवं अत्यंत प्रभावशाली अनुष्ठान है, जो उन पितरों की आत्मशांति के लिए किया जाता है जिनका विधिवत श्राद्ध कर्म तीन वर्ष अथवा उससे अधिक समय से नहीं हुआ हो। इस पूजा में तीन पिंड (चावल अथवा जौ के आटे से बने गोले) बनाकर तीन पीढ़ियों — पिता, पितामह एवं प्रपितामह की ओर से तर्पण किया जाता है, और अंत में इन पिंडों को पवित्र गोदावरी नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है।
त्रिपिंडी श्राद्ध विशेष रूप से उन पितरों के लिए किया जाता है जिनकी मृत्यु असामान्य परिस्थितियों में हुई हो, अथवा जिनका उचित अंतिम संस्कार एवं श्राद्ध कर्म समय पर संपन्न न हो सका हो।
त्र्यंबकेश्वर को गोदावरी नदी का उद्गम स्थल होने के कारण "दक्षिण गंगा" कहा जाता है, और शास्त्रों में इसे पितृ कर्मों के लिए सर्वाधिक पुण्यदायी स्थान बताया गया है। यहाँ भगवान शिव स्वयं त्रिमुखी ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हैं, जो पितरों को मोक्ष प्रदान करने में सक्षम माने जाते हैं। यही कारण है कि गया श्राद्ध के समान ही त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए भी त्र्यंबकेश्वर को विशेष स्थान प्राप्त है।
यह अनुष्ठान गोदावरी नदी के पवित्र तट पर विधिवत रूप से संपन्न कराया जाता है। सर्वप्रथम गणपति पूजन एवं संकल्प लिया जाता है, इसके पश्चात पितरों के निमित्त तीन पिंड तैयार किए जाते हैं। पुरोहित द्वारा गरुड़ पुराण एवं अन्य धर्मशास्त्रों में वर्णित विशेष मंत्रों का उच्चारण करते हुए इन पिंडों पर तर्पण किया जाता है। पूजा में तिल, जौ, कुशा (पवित्र घास), पुष्प एवं गंगाजल का विशेष उपयोग होता है। अंत में ब्राह्मण भोज एवं दान-दक्षिणा के साथ इन पिंडों को गोदावरी नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है, जिससे पितरों की आत्मा को शांति एवं मुक्ति प्राप्त होती है।
यह पूजा विशेष रूप से उन परिवारों के लिए अनुशंसित है जिनके घर में पीढ़ियों से चली आ रही समस्याएं हों, अथवा जिनके पूर्वजों का उचित श्राद्ध कर्म संपन्न नहीं हो सका हो। पूजा करवाने से पूर्व किसी विश्वसनीय पंडित से परामर्श लेना उचित रहता है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि वास्तव में त्रिपिंडी श्राद्ध की आवश्यकता है या किसी अन्य पूजा (जैसे नारायण नागबलि अथवा पितृ दोष निवारण) की। पंडित संदीप देवांश त्रिपाठी जी निःशुल्क परामर्श सेवा भी प्रदान करते हैं।