पूर्वजों के आशीर्वाद से जीवन में सुख-समृद्धि

पितृ दोष हिंदू ज्योतिष एवं धर्मशास्त्र का वह विषय है जो पूर्वजों (पितरों) की अतृप्ति अथवा असंतुष्टि से संबंधित है। जब किसी परिवार के पूर्वजों का विधिवत श्राद्ध कर्म नहीं किया जाता, अथवा उनकी मृत्यु असामान्य परिस्थितियों (दुर्घटना, अकाल मृत्यु) में हुई हो, तो उनकी आत्मा को शांति नहीं मिल पाती। यह अतृप्त आत्माएं अपने वंशजों की कुंडली में सूर्य, चंद्र, अथवा गुरु ग्रह पर प्रभाव डालकर पितृ दोष उत्पन्न करती हैं।
ज्योतिषीय दृष्टि से पितृ दोष की पहचान कुंडली में नवम भाव पर पाप ग्रहों के प्रभाव और सूर्य के साथ राहु अथवा केतु की स्थिति से की जाती है।
पितृ दोष निवारण पूजा में मुख्यतः पिंडदान, तर्पण एवं ब्राह्मण भोज सम्मिलित होते हैं। यह पूजा गोदावरी नदी के तट पर विधिवत रूप से संपन्न कराई जाती है, जिसमें पुरोहित द्वारा गरुड़ पुराण एवं वायु पुराण में वर्णित मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। पूजा में तिल, जौ, कुशा (पवित्र घास), एवं गंगाजल का विशेष उपयोग होता है। अंत में ब्राह्मणों को भोजन तथा दान देकर पितरों की तृप्ति सुनिश्चित की जाती है।
पितृ दोष निवारण के लिए गया श्राद्ध का सार त्र्यंबकेश्वर में भी उपलब्ध कराया जाना — जहां पुरोहित विशेष संक्षिप्त परंतु प्रभावी विधि से यह कर्म संपन्न कराते हैं, विशेषकर उन भक्तों के लिए जो गया जाकर श्राद्ध करने में असमर्थ हों।